व्रतपते ! बल के भण्डारा, प्रातः काल, मैं पुत्र तुम्हारा |
तव चरणन में चित्त देता हूँ, सुन्दर समय पर व्रत लेता हूँ |
दिन भर मैं ना पाप करूँगा, प्रात: सायं जाप करूँगा |
सब अंगों को वश में करके, शुभ मार्ग में सदा विचरके |
कर्म मैं वेद अनुसार करूँगा, शुभ कर्मों से प्यार करूँगा |
धर्मपूर्वक करूँगा गुजारा, केवल तेरा रहे सहारा |
पर उपकार में रहे जीवन, धन बल तेरे कर दूँ अर्पण |
जब ही मन में पाप समावे, जब ही बुद्धि कुमार्ग जावे |
तब ही दया अपार दिखाओ, पाप कर्म से पभु बचाओ |
प्रातः काल तुझे नित ध्यावें, आलस्य निद्रा दूर भगावें |
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