साम श्रद्धा : बन्धन मुक्ति
Submitted by Rajendra P.Arya साम वन्दना
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ओ३म् उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं
श्रथाय ।
अथा दित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम ।।सामवेद 589 ।।
अथा दित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम ।।सामवेद 589 ।।
व्रत पालन की दृढ़ता लायें ।
बन्ध हमारे खुलते जायें ।।
बन्ध हमारे खुलते जायें ।।
ज्ञान इन्द्रियों के अभिनन्दन ।
कीर्ति कामना उत्तम बन्धन ।
संकल्प साधना के द्वारा,
इनसे हम ऊपर उठ जायें ।।
कीर्ति कामना उत्तम बन्धन ।
संकल्प साधना के द्वारा,
इनसे हम ऊपर उठ जायें ।।
हृदय भावना के अवगुंठन ।
देह धारणा मध्यम बन्धन ।
सौन्दर्य स्वाद की सीमायें,
ये सभी शिथिल होती जायें ।।
देह धारणा मध्यम बन्धन ।
सौन्दर्य स्वाद की सीमायें,
ये सभी शिथिल होती जायें ।।
काम वासना अति अनाचार ।
यह घृणित अधम बन्धन अपार ।
दुरित ग्रन्थियाँ हीन हमारी,
सभी नाथ ये खुलती जायें ।।
यह घृणित अधम बन्धन अपार ।
दुरित ग्रन्थियाँ हीन हमारी,
सभी नाथ ये खुलती जायें ।।
राजेन्द्र आर्य
संगरूर
संगरूर
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