शनिवार, 29 मार्च 2014

फूलों से तुम हँसना सीखो, भँवरों से तुम गाना |

फूलों से तुम हँसना सीखो, भँवरों से तुम गाना |
सूरज की किरणों से सीखो, जागना और जगाना |
धुएँ से तुम सारे सीखो, ऊँची मंजिल जाना |
वायु के झोंको से सीखो, हरकत में ले आना |
वृक्षों की डाली से सीखो, फल पाकर झुक जाना |
मेहंदी के पत्तों से सीखो, पिस पिस रंग चढ़ाना |
पत्ते और पेड़ों से सीखो, दुःख में धीर बंधाना |
धागे और सुई से सीखो, बिछुड़े गले लगाना |
मुर्गों की बोली से सीखो, प्रातः प्रभु गुण गाना |

पानी की मछली से सीखो, धर्म के हित मर जाना |

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

बचपन की याद दिला दिया। बचपन में इस कविता को पड़ते थे। बहुत अच्छा है। मैं इसे बहुत ढूंढ रहा था, बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता को हिंदी मेँ नेट पर पोस्ट करने के लिए।