शनिवार, 29 मार्च 2014

धरती की शान, तू है मनु की सन्तान |

धरती की शान, तू है मनु की सन्तान |
तेरी मुट्ठियों में बन्द तूफ़ान है रे ऽ ऽ
मनुष्य तू बड़ा महान् है – भूल मत ||
तू जो चाहे पर्वत पहाड़ों को फोड़ दे |
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड़ दे ||
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे |
तू जो चाहे धरती से अम्बर को जोड़ दे ||
अमर तेरे प्राऽऽऽण , अमर तेरे प्राण मिला तुझको वरदान |
तेरी आत्मा में स्वयं भगवान् हैं रे ऽ मनुष्य तू ...||१||
नैनों में ज्वाल, तेरी गति में भूचाल |
तेरी छाती में छिपा महाकाल है ||
धरती के लाल, तेरा हिमगिरी सा भाल |
तेरी भृकुटी में ताण्डव का ताल है ||
निज को तो जाऽऽऽन, निज को तू जान जरा शक्ति पहचान |
तेरी वाणी में युग का आह्वान है रे ऽ मनुष्य तू ... ||२||
धरती सा धीर तू है अग्नि सा वीर |
अरे तू जो चाहे काल को भी थाम ले ||
पापों का प्रलय रुके, पशुता का शीश झुके |
तू जो अगर हिम्मत से काम ले ||
गुरु सा मतिमाऽऽऽऽन, गुरु सा मतिमान पवन सा तू गतिमान |

तेरी नभ से भी ऊँची उड़ान है रे . ऽ मनुष्य तू .....||३||

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